हर साल 1 दिसंबर को पूरा विश्व “विश्व एड्स दिवस” (World AIDS Day Hindi) मनाता है। यह वो दिन है जब हम सब एक साथ खड़े होकर एचआईवी–एड्स से लड़ने का संकल्प लेते हैं, उन लाखों लोगों को याद करते हैं जिनकी जान इस बीमारी ने ले ली और जो आज भी इस वायरस के साथ जिंदगी जी रहे हैं, उन्हें सम्मान और सहारा देते हैं। साल 2025 का थीम है – “Take the Rights Path: My Health, My Right!” यानी “अपने अधिकारों का रास्ता चुनो – मेरा स्वास्थ्य, मेरा अधिकार!”
आज भी भारत समेत पूरी दुनिया में लाखों लोग एचआईवी पॉजिटिव हैं। अच्छी बात यह है कि अब दवा और जागरूकता की वजह से एड्स से मौतें बहुत कम हो गई हैं, लेकिन अभी भी यह बीमारी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इसलिए विश्व एड्स दिवस आज भी उतना ही जरूरी है जितना 1988 में पहली बार मनाया गया था।
विश्व एड्स दिवस क्यों मनाया जाता है?
इस दिन का सबसे बड़ा मकसद है –
- लोगों को एचआईवी–एड्स के बारे में सही जानकारी देना
- इस बीमारी से जुड़े डर, शर्म और भेदभाव को खत्म करना
- एचआईवी पॉजिटिव लोगों को समाज में बराबरी का हक दिलाना
- सरकारों और संस्थाओं को याद दिलाना कि अभी काम बाकी है
लाल रिबन (Red Ribbon) इस दिन का आधिकारिक प्रतीक है। इसे छाती पर लगाकर हम कहते हैं – “मैं एचआईवी प्रभावित लोगों के साथ हूं।”
एचआईवी और एड्स में फर्क समझिए – बहुत आसान भाषा में
बहुत से लोग एचआईवी और एड्स को एक ही समझते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है।
- एचआईवी (HIV) एक वायरस है जो हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून सिस्टम) को कमजोर कर देता है।
- एड्स (AIDS) उस आखिरी स्टेज का नाम है जब इम्यून सिस्टम लगभग खत्म हो जाता है और छोटी-छोटी बीमारियाँ भी जान लेने लगती हैं।
यानी हर एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को एड्स नहीं होता, बशर्ते वह समय पर दवा शुरू कर दे। आज की एआरटी (Anti-Retroviral Therapy) दवा इतनी कारगर है कि एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति पूरी उम्र स्वस्थ और सामान्य जीवन जी सकता है, शादी कर सकता है, बच्चे पैदा कर सकता है और किसी को संक्रमण भी नहीं फैला सकता (जब वायरल लोड अंडिटेक्टेबल हो जाए)।
भारत में एचआईवी–एड्स की मौजूदा स्थिति (2025 तक)
नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (NACO) के ताजा आंकड़ों के अनुसार:
- भारत में लगभग 24–25 लाख लोग एचआईवी के साथ जी रहे हैं।
- हर साल करीब 70–80 हजार नए मामले सामने आते हैं।
- अच्छी खबर: पिछले 10 सालों में नए संक्रमण 50% से ज्यादा कम हुए हैं।
- माँ से बच्चे में संक्रमण का खतरा 1% से भी कम रह गया है।
तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना और नागालैंड अभी भी सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य हैं, लेकिन अब उत्तर भारत के राज्य जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी मामले बढ़ रहे हैं।
एचआईवी कैसे फैलता है? (सबसे आम गलतफहमियाँ दूर करें)
फैलता है:
- असुरक्षित यौन संबंध (बिना कंडोम के)
- इस्तेमाल की हुई सुई या सीरिंज शेयर करने से (खासकर नशा करने वालों में)
- संक्रमित माँ से गर्भ में या दूध पिलाते समय बच्चे को
- संक्रमित खून चढ़ाने से (अब बहुत कम होता है क्योंकि ब्लड बैंक स्क्रीनिंग करते हैं)
फैलता नहीं है:
- हाथ मिलाने, गले लगने, एक साथ खाना खाने से
- एक ही शौचालय इस्तेमाल करने से
- मच्छर या किसी कीड़े के काटने से
- एक ही कप या गिलास शेयर करने से
फिर भी आज भी गांवों में लोग एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति को छूने से डरते हैं। यह डर जानकारी की कमी की वजह से है।
आज की सबसे बड़ी चुनौतियाँ क्या हैं?
- स्टिग्मा और डिस्क्रिमिनेशन स्कूल से निकाल देना, नौकरी न देना, किराए का घर न देना – ये सब आज भी हो रहा है।
- देर से जांच ज्यादातर लोग तब टेस्ट कराते हैं जब बीमारी बहुत आगे बढ़ चुकी होती है।
- युवाओं में जागरूकता की कमी आजकल डेटिंग ऐप्स और हुकअप कल्चर बढ़ रहा है, लेकिन कंडोम का इस्तेमाल बहुत कम हो रहा है।
- ट्रांसजेंडर और सेक्स वर्कर्स तक दवा और सहायता पहुँचाना।
हम सब मिलकर क्या कर सकते हैं?
हर आम इंसान की छोटी-छोटी कोशिशें मिलकर बड़ी क्रांति ला सकती हैं:
- अपने दोस्तों–रिश्तेदारों को सही जानकारी दें।
- अगर कभी शक हो तो बिना डरे मुफ्त सरकारी केंद्र पर एचआईवी टेस्ट करवाएँ (100% गोपनीय रहता है)।
- शारीरिक संबंध बनाने से पहले कंडोम का इस्तेमाल जरूर करें।
- नशा करने वाले दोस्तों को सुई शेयर न करने के लिए समझाएँ।
- सोशल मीडिया पर लाल रिबन लगाकर और सही मैसेज शेयर करके जागरूकता फैलाएँ।
सरकार और संस्थाएँ क्या कर रही हैं?
- पूरे देश में 40,000 से ज्यादा मुफ्त टेस्टिंग सेंटर और एआरटी सेंटर हैं।
- दवा पूरी तरह मुफ्त और आजीवन दी जाती है।
- “Test and Treat” पॉलिसी – जैसे ही पता चलता है, उसी दिन दवा शुरू हो जाती है।
- PrEP (प्री–एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस) दवा अब कुछ राज्यों में हाई–रिस्क लोगों को दी जा रही है जो संक्रमण होने से पहले ही सुरक्षा देती है।
एक सच्ची कहानी – प्रेरणा की मिसाल
मुंबई की 35 साल की रेखा (बदला हुआ नाम) को 2015 में पता चला कि वह एचआईवी पॉजिटिव हैं। पति ने छोड़ दिया, ससुराल ने घर से निकाल दिया। लेकिन रेखा ने हार नहीं मानी। सरकारी केंद्र से दवा शुरू की, आज वह पूरी तरह स्वस्थ हैं, एक एनजीओ में काउंसलर का काम करती हैं और सैकड़ों महिलाओं को हिम्मत देती हैं। वह कहती हैं, “एचआईवी मेरी जिंदगी का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत थी।”
ऐसी हजारों कहानियाँ हैं जो बताती हैं कि एचआईवी के साथ भी खूबसूरत और सम्मानजनक जिंदगी जी जा सकती है। World AIDS Day Hindi
2030 तक एड्स खत्म करने का सपना
संयुक्त राष्ट्र ने 2030 तक एड्स को सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरे के रूप में खत्म करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए 95–95–95 टारगेट है:
- 95% एचआईवी पॉजिटिव लोगों को पता हो कि वे पॉजिटिव हैं
- 95% पॉजिटिव लोगों को दवा मिले
- 95% दवा लेने वालों का वायरल लोड अंडिटेक्टेबल हो
भारत इस लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है। अगर हम सब मिलकर स्टिग्मा खत्म करें और टेस्टिंग बढ़ाएँ तो यह सपना सच हो सकता है।
अंत में – एक छोटा सा संदेश
एचआईवी कोई अपराध नहीं, कोई पाप नहीं – यह बस एक वायरस है जिसका इलाज है। जिस दिन हम सब इसे सामान्य बीमारी की तरह स्वीकार कर लेंगे, उसी दिन एड्स अपने आप हार जाएगा।
इस विश्व एड्स दिवस पर लाल रिबन लगाइए, अपने आस–पास के लोगों को सही जानकारी दीजिए और अगर कभी जरूरत पड़े तो बिना डरे टेस्ट कराइए।
क्योंकि जब तक एक भी व्यक्ति एचआईवी से अकेले लड़ रहा होगा, तब तक हमारी लड़ाई जारी रहेगी। आइए, इस बार संकल्प लें – “कोई अकेला नहीं लड़ेगा, हम सब साथ हैं!”
Happy World AIDS Day 2025 ❤️ लाल रिबन – उम्मीद, हिम्मत और एकजुटता का प्रतीक।






